Monday, April 26, 2010

कुछ शब्द मेरे अपने (प्रिय कंहाँ हो )


किंचित ! अब प्रभात है,
मेरे जीवन का ,
कितने मन-मयूर ,कोकिला
आराध्य मेरे खोये रहें ,
प्रिय वक्ष प़र अनेकों बार
मन को समझातीं हूँ ,
किं
धर शीश ;
स्वप्न मेरे
मिलन अधरों का,
लहर उठे तन-मन में ,
मेरे सुर-सगीत निछावर
प्रिय के अनुराग में,
प्राण मन के मीत मेरे
स्वप्न के आधार.....
कंहा हो???????
मेरे अंगना
नाचने को आशान्वित हैं!
रचूँगी दिवास्वप्न ,
गढ़ूंगी आकृतियाँ
बावरा मन नित
नए स्वप्न बुनता है
मेरे मीत
निहारते मेरा रूप,
चंदा-चांदनी का खेल
हौले से मूंदें नेत्र
ढूढंती हर क्षण प्रिय ......
डॉ। शालिनीअगम
३१/०७/89

Sunday, April 25, 2010

कुछ शब्द मेरे अपने (पिता के लिए )

गुप्तजी ने लिखा था कि..........राम तुम इश्वर नहीं मानव हो क्या,प़र मैं कहती हूँ पिताश्री,राम! तुम मानव नहीं इश्वर हो क्या? सदैव सहज मुस्कान,निस्पृहता, मौन ,उदात्त ,निस्संगता से, अपने भीतर लबालब स्नेह से भरे, इस धरती प़र, संबंधों प़र,स्नेह- निर्झर से बहते ,मैं जानती हूँ ............आपका मौन अभिमान नहीं,मनन होता है , निरावेगी रूप के पीछे , प्रेम का आवेग होता है, सहज , सरल , व्यक्तित्व , बेहद निर्मल , विनयशील है,पिता! आप ही नम्र आत्मीय ,मर्मज्ञ प्रबुद्ध हैं ,दिखावटी संभ्रांत नहीं ,एकान्तिक भोले-भंडारी हैं , जो अपनी उपस्तिथि से , अपना परिवेश अनजाने में ही, सुवासित करते रहतें हैं, ..................................अगर दो में से एक भी संतान को,आपके कुछ गुण उधार लेकर (हकपूर्वक) उनमें डाल सकूं ,अगर जीवन-समर में , कहीं भीं कभी भी स्वम जीत कर आपका , मान रख सकूं , तो हे राम ! राम -सुता होने , का दायित्व निभा सकूं,................................
पिता के जन्म-दिन प़र, ५ सितम्बर
१९९५डॉ.शालिनीअगम
your lines as sweet as honey.your words are as pious as father's love.your phrases are as expressive as some poet's thinking.your poem as remarkable as orientation as Taaj-Mahal.Dr.sona
Aah! how much lovely words u have written
dr. Shalini u r amazing

Monday, April 19, 2010

Dr.Sweet Angel (SHUBH AAROGYAM)

अन्धविश्वास और विश्वास के बीच एक बहुत ही छोटा सा अंतर होता है,एक महीन सी रेखा होती है.हम विश्वास का पर्वत किसी निश्चित तथ्य के आधार प़र ही खड़ा करते हैं .हम सब ये तो अच्छी तरह से जानतें है कि इस परम सत्ता को चलाने वाली कोई शक्ति है, वही शक्ति है जो चमत्कार का भण्डार है,विश्वास से अद्भुत और असंभव कार्य सिद्ध हो जातें हैं .अन्धविश्वास का कोई ठोस आधार नहीं होता. किसी भ्रम या कल्पना को आधार बना कर वह अपनी जड़ें जमाता है .अनेक पण्डे, ओझा, तांत्रिक और एजेंट जैसे लोग उस भ्रम को हवा देते हैं . मेरे ही पडौस में एक पति ने अपनी पत्नी से छह : महीने तक केवल इसलिए रिश्ता नहीं रखा क्योंकि किसी पण्डे ने पति को उसकी तरक्की के लिए पत्नी से दूर रहने कि सलाह दी थी ....परिणाम तलाक कि नौबत आ गयी.इस प्रकार के चमत्कारी बाबाओं को अन्धविश्वासी लोगों कि खोज रहती है ,क्योंकि कम समय में अधिक लाभ का चमत्कार ये देखना चाहतें हैं अन्धविश्वास का सम्मोहन इन्हें आकर्षित करता है.सामान्य लोग मान्यताओं और परम्पराओं के सहारे जीतें हैं .वे हर बात को तर्क कि कसौटी प़र रख कर नहीं देखते.अन्धविश्वास फ़ैलाने वाले सामान्य जन के उस मनोविज्ञान को समझतें है .वे जानतें है कि कैसे कोई व्यक्ति किसी चीज के लिए स्वाभाविक रूप से तैयार किया जा सकता है उसे वे परम्पराओं और मान्यताओं क़ी दुहाई देकर समझातें है हम लोगों ने भौतिक प्रगति तो कर ली है ,शिक्षित और सभ्य भी कहलातें हैं प़र मानसिक स्तर प़र हम संकीर्ण और अंध-विश्वासी ही बने हुएँ हैं लेकिन हमें अंधे का भरोसा नहीं करना है.इश्वर तो हमारे भीतर ही है . जो सबकुछ जनता है,समझता है .सर्व-समर्थ है. उसको मानाने के लिए बाहर के गंडे-तावीज ,राख-भस्म क़ी ज़रुरत नहीं होती है.अत: सब कुछ छोड़कर अपने दुःख-कष्ट निवारण के लिए केवल अपनी ओर उन्मुख होना चाहिए .अपने भीतर ही वह इश्वर है जो चमत्कार का भण्डार है.इसलिए सर्व -शक्तिमान प़र विश्वास तो करो पर अन्धविश्वासी मत बनो.डॉ.शालिनीअगम२०१०
so trust yur self

MY POSITIVE THINKING IS MY BEST FRIEND

NEVER LET MYSELF BECOME DISCOURAGED.NEVER GIVE IN TO A NEGATIVE, AS EASY AS THAT MAY BE TO DO. REMIND MYSELF OF THE POWER I HAVE, THE POWER OF FAITH.
....................................SHALINIIAGAM
2010

कुछ शब्द मेरे अपने

मैं आभारी हूँ उस परमात्मा की ,मेरे जीवन का हर-पल एक उत्सव के समान है ।
सुबह आँखे खोलने से लेकर रात को सोने तक
मैं और मेरा परिवार हर-पल आनंद का अनुभव् करता है।
मेरी सभी इच्छाएं स्वतः ही पूरी हो जाती हैं ।
मैं खुश हूँ और खुशियाँ बाँटती हूँ
डॉ.शालिनीअगम
2O10

video

Sunday, April 18, 2010

कुछ शब्द मेरे अपने

आँखे दूर तलक ,
पीछा करतीं रहीं उनका ,
मौन मन साथ पाने को,
तरसता रहा .........
अपना सर्वस्व न्योछावर ,
करके भी .......
किंचित अपना ना
बना पाई उन्हें !!!
डॉ.शालिनीअगम
2010

Saturday, April 17, 2010

कुछ शब्द मेरे अपने प्यार की परिभाषा

प्यार की परिभाषा
प्यार की परिभाषा है क्या ,
कोई मुझे बताये ,
प्यार कहते हैं किसको
ये ज़रा समझाए .
प्रेम होता है जिससे .......
समीपता लगती है भली,
पिया संग रहें सदा
प्यास रहती है यही,
उनकी ज़रा सी बेरुखी,
सही जाती नहीं है,
उनका बेगानापन थोडा भी,
भेद जाता है मन को ,
उनके दूर होते ही ,
पल युगों में बदलतें हैं ,
घडी-घडी पलकें बिछाएं ,
नैन राह को तकतें हैं,
हर आहट पर धड़कता है दिल,
मन की गहराईयों में छिपी चाह,
सीमायें तोड़ देती हैं सभी,
प्यास बुझती है तभी आँखों की,
होती है प्रियतम से जब दो-चार/
डॉ.शालिनीअगम
१०८९ से अब तक
कुछ शब्द मेरे अपने

सौंदर्य का सार

सौंदर्य का सार
सौंदर्य ........................................
भला लगता है नेत्रों को,
सुखद लगता है स्पर्श से,
सम्पूर्ण विश्व एक अथाह सागर ,
जिसमें भरा है सौंदर्य अपार ,

हर चर-अचर हर प्राणी ,
सौंदर्य को पूजता है बारम्बार !
सौंदर्य का कोष है पृथ्वी-लोक ,
सौंदर्य का भण्डार है देव- लोक,
प्रत्येक पूजित-अपूजित व्यक्ति,
कल्पना करता है तो केवल ,
सौंदर्य को पाने की ,
परन्तु......................
ऐसे कितने मिलते हैं यंहा ,
जो रूपता-कुरूपता को,
समान पलड़े प़र तोलते हैं ,
जो चाहतें हैं मानव-मात्र को
मानते हैं दोनों को समान?
डॉ.शालिनीअगम
1989

Friday, April 16, 2010

Tip of the day

यह जो हमारी लाइफ है न ,हर बार दो रास्ते नज़र आयेंगे ....... हर पल मन में अनेक आवाजें सुनाई देंगीं .........उलझन का समय आएगा...........
ये काम करूँ या ना करूँ , इस रास्ते जाऊं या उस रास्ते जाऊं .इस उलझन और संशय कि स्तिथि में स्वयम की ही सोच काम करेगी.
भटकना छोड़ कर मनन करें , केवल अपने मन की बात प़र ध्यान दें .केवल अपने मन कि बात को जानने प़र ही सच्चाई को जान पाओगे.
उलझन से बचने का एक ही रास्ता है, केवल अपने मन कि बात सुनो ,self-centered होकर ही जीत पा सकते हो . अगर तुमने अपने अंदर
की आवाज को पहचान लिया है तो बाहर कुछ भी पाने की , ढूढने की आवश्यकता नहीं है ,
अपनी आँखे खुली रखो , तभी सच जान पाओगे, जब अपनी आँखें बंद रखोगे तो सच भी भीतर ही बंद हो जाएगा .
अपने अंदर की आवाज जो तुमने खुद ही मनन करके सुनी है,उसी में से ,तुम्हारे भीतर से एक नया ,चमकता हुआ ,आत्मनिर्भर,
केवल तुम्हारा ही विजय-गान सामने आएगा ,और देखो ........... जीवन मस्त और कितना खुशहाल बन रहा है
तुम्हारा जीवन निराशा के अँधेरे से निकल कर आशा के उजाले से भर रहा है.
so s

Thursday, April 15, 2010

कुछ शब्द मेरे अपने (स्व:)

कुछ शब्द मेरे अपने (स्व:)
कौशार्य की विस्मृत कोमलता लौट आने को है,
बचपन के उमंग , उल्लास ,स्वच्छंदता ,गीत-नाद ,
उत्सव------ सब कुछ लुप्त हुए थे कभी ,
प़र साजन के प्रेम में भीगी ,
चपल खंजन-सी ,फुदकती,चहकती ,
नवयुवती अलसाने को है!
डॉ.शालिनीअगम
2002

कुछ शब्द मेरे अपने (स्व:)

कुछ शब्द मेरे अपने (स्व:)
कौशार्य की विस्मृत कोमलता लौट आने को है,
बचपन के उमंग , उल्लास ,स्वच्च्छंद्ता,गीत-नाद ,
उत्सव------ सब कुछ लुप्त हुए थे कभी ,
प़र साजन के प्रेम में भीगी ,
चपल खंजन-सी ,फुदकती,चहकती ,
नवयुवती अलसाने को है!
डॉ.शालिनीअगम
2002

कुछ शब्द मेरे अपने

दुःख तो साथी है मेरा , लम्बी पहचान है,
उसे मानने का मन है , वो है तो मैं हूँ,
यही तो है मेरा यथार्थ , यही तो है अपना सा,
हर-पल मेरा साया, कभी छोड़ता ना पीछा ,
दुःख कहती हूँ , तो आँखों में एक रस होता है,
निर्झर बहते अश्रु, कहते हैं कि मैं हूँ !
घावों को कुरेदती हूँ , तन में पीड़ा होती है,
कराहते बदन , कहते है कि मैं हूँ !
पीड़ा होती है , तो अस्तित्व का भान होता है ,
एकाकी , मायूस मन, कहते है कि मैं हूँ !
इस दुःख के बिना , मैं हो ही नहीं सकती,
बिना मांगे , बिन बुलाये भागा चला आता है,

मेरे सबसे पास , सबसे करीब ,
अब तो दुःख में ही , रस आता है,
मेरे होने में ही , मेरा दुःख नियोजित है,
क्योंकि मेरा दुःख है , तो में हूँ!
डॉ. शालिनीअगम
www,aarogyamreiki.com

!

कुछ शब्द मेरे अपने

दुःख तो साथी है मेरा , लम्बी पहचान है,
उसे मानने का मन है , वो है तो मैं हूँ,
यही तो है मेरा यथार्थ , यही तो है अपना सा,
हर-पल मेरा साया, कभी छोड़ता ना पीछा ,
दुःख कहती हूँ , तो आँखों में एक रस होता है,
निर्झर बहते अश्रु, कहते हैं कि मैं हूँ !
घावों को कुरेदती हूँ , तन में पीड़ा होती है,
कराहते बदन , कहते है कि मैं हूँ !
पीड़ा होती है , तो अस्तित्व का भान होता है ,
एकाकी , मायूस मन, कहते है कि मैं हूँ !
इस दुःख के बिना , मैं हो ही नहीं सकती,
बिना मांगे , बिन बुलाये भागा चला आता है,

मेरे सबसे पास , सबसे करीब ,
अब तो दुःख में ही , रस आता है,
मेरे होने में ही , मेरा दुःख नियोजित है,
क्योंकि मेरा दुःख है , तो में हूँ!
डॉ. शालिनीअगम
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Wednesday, April 14, 2010

कुछ शब्द मेरे अपने

ना मायूस होने प़र सांत्वना दी ,
ना उदास होने प़र कभी गले से लगाया ,
ना कभी मेरी तरक्की में शाबाशी दी,
ना कभी मेरे रोने प़र आंसू पोंछे,
ना हंसना चाहा तो हंसने दिया,
ना कोई गीत कभी गुनगनाने दिया,
जब भी कभी अकेले जीने कि हिम्मत जुटाई,
तो अंदर कि आत्मा को भी कुचल कर......
साथ छोड़ने प़र मजबूर कर दिया,
ऐसा ही था
मेरा और उसका रिश्ता
ना प्रेम का ना दर्द का!
डॉ.शालिनिअगम
www.aarogyamreiki.com

कुछ शब्द मेरे अपने.

तो क्या छोड़ दूं ?
अपनी सीमाओं को,
क्षुद्रताओं कों???????????
और वरण कर लूं असीम को,
क्या ये सारा आकाश मेरा है,?
और पृथ्वी के सारे सुख मेरे हैं?
क्या उठूं और आलिंगन कर लूं
जीवन का ??????????
डॉ. शालिनिअगम

कुछ शब्द मेरे अपने.

काश! उत्सव आ जाए ,
दीये ही दीये जल जाएँ ,
फूल ही फूल खिल जाएँ,
जो मैने जाना, मैंने जिया ,
मैंने पहचाना .........
कुछ न मिला...................
काश!
भीतर मेरी आत्मा का स्नान हो जाये ,
भीतर में स्वच्छ हो जाऊं ,
भीतर में आनंदमग्न हो जाऊं........
डॉ.शालिनिअगम
www.aarogyamreiki.com

kuch shabd mere apne

show details 1:58 PM (3 minutes ago)

कुछ देर सिमट कर जी लूं मैं,
तुम्हारे मखमली आगोश में,
कुछ देर मचल कर अंगड़ाई लूं मैं,
महकती गर्म साँसों के घेरे में,
सहमी तर तराई इस ख़ुशी को ,
समेट लो अपने बाजुओं में ,
टिकी रहे देर तक मुझ प़र,
भुला दे,जो मुझसे मुझको,
मादकता में बहके हम दोनों,
खों जाएँ एक-दूसरे में.....................
डॉ.शालिनीअगम
व्व्व.aarogyamreiki.com

Tuesday, April 13, 2010

Tip of the day

Always welcome a new day with a
'Smile' on your lips,
'Love' in your heart ,
'Good thoughts' in your mind,
And you will have a
Wonderful day Ahead...!!!

dr.shaliniagam
www.aarogyamreiki.com

kuchshabdmereapne: Tip of the day

kuchshabdmereapne: Tip of the day

Monday, April 12, 2010

abhilaasha

हे : प्रभु! बना दो मुझे एसा तरु ,
निर्लिप्त भाव से सबकी सेवा मैं करू,
फल- फूलों से हों आचार- विचार,
चंव,तने,जड़ सब जैसे संस्कार,
झुकी रहूँ सदैव तरु कि डालियों सी,
तृषा मिटाऊँ जग कि जठराग्नि की,
हर टूटे-थके मन को दूँ आराम,
व्यर्थ है जीवन न आये गर किसी काम,
मेरी शीतल छाया ले मेरा परिवार,
झर-झराऊँ पुष्पों को उन पार बारम्बार!
डॉ.शालिनीअगम,
1997