हे : प्रभु! बना दो मुझे एसा तरु ,
निर्लिप्त भाव से सबकी सेवा मैं करू,
फल- फूलों से हों आचार- विचार,
चंव,तने,जड़ सब जैसे संस्कार,
झुकी रहूँ सदैव तरु कि डालियों सी,
तृषा मिटाऊँ जग कि जठराग्नि की,
हर टूटे-थके मन को दूँ आराम,
व्यर्थ है जीवन न आये गर किसी काम,
मेरी शीतल छाया ले मेरा परिवार,
झर-झराऊँ पुष्पों को उन पार बारम्बार!
डॉ.शालिनीअगम,
1997