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Saturday, August 28, 2010

Dr.Sweet Angel (SHUBH AAROGYAM) मैं ही सर्व शक्तिमान हूँ


मैं ही सर्व शक्तिमान हूँ
अरे ! क्या हुआ निराश होकर क्यों बैठे हो ? क्या अपने ऊपर संदेह हो रहा है ? जब मानव सर्व -शक्तिमान है तो उसे संदेह क्यों होता है ॥ अपने ऊपर विश्वास न होना ही उसके अंदर की छिपी कमजोरी को बताता है ....

१- अपने अंदर सर्व-शक्तिमान होने का एहसास जगाइए और कठिन से कठिन कार्यों को भी संभव करने में जुट जाइये ।

२-जो लोग अपनी शक्ति को पहचान लेते हैं , उन्हें सफलता प्राप्त करने से कोई रोक नहीं सकता।

३-जीवन एक चुनौती है ,एक अभियान है ,जिसे जीकर -जाना जा सकता है लेकिन गणित के सवालों कि तरह हल नहीं किया जा सकता है बार-बार असफल होने के बावजूद अपने ऊपर विश्वास रखें ,अपनी योग्यता में कमी न आने दें

४- यदि हम अपनी कमियों को अपनी शक्ति बना लें तो अपने कार्य क्षेत्र में सफल होने से आपको कोई रोक नहीं सकता


Monday, April 19, 2010

Dr.Sweet Angel (SHUBH AAROGYAM)

अन्धविश्वास और विश्वास के बीच एक बहुत ही छोटा सा अंतर होता है,एक महीन सी रेखा होती है.हम विश्वास का पर्वत किसी निश्चित तथ्य के आधार प़र ही खड़ा करते हैं .हम सब ये तो अच्छी तरह से जानतें है कि इस परम सत्ता को चलाने वाली कोई शक्ति है, वही शक्ति है जो चमत्कार का भण्डार है,विश्वास से अद्भुत और असंभव कार्य सिद्ध हो जातें हैं .अन्धविश्वास का कोई ठोस आधार नहीं होता. किसी भ्रम या कल्पना को आधार बना कर वह अपनी जड़ें जमाता है .अनेक पण्डे, ओझा, तांत्रिक और एजेंट जैसे लोग उस भ्रम को हवा देते हैं . मेरे ही पडौस में एक पति ने अपनी पत्नी से छह : महीने तक केवल इसलिए रिश्ता नहीं रखा क्योंकि किसी पण्डे ने पति को उसकी तरक्की के लिए पत्नी से दूर रहने कि सलाह दी थी ....परिणाम तलाक कि नौबत आ गयी.इस प्रकार के चमत्कारी बाबाओं को अन्धविश्वासी लोगों कि खोज रहती है ,क्योंकि कम समय में अधिक लाभ का चमत्कार ये देखना चाहतें हैं अन्धविश्वास का सम्मोहन इन्हें आकर्षित करता है.सामान्य लोग मान्यताओं और परम्पराओं के सहारे जीतें हैं .वे हर बात को तर्क कि कसौटी प़र रख कर नहीं देखते.अन्धविश्वास फ़ैलाने वाले सामान्य जन के उस मनोविज्ञान को समझतें है .वे जानतें है कि कैसे कोई व्यक्ति किसी चीज के लिए स्वाभाविक रूप से तैयार किया जा सकता है उसे वे परम्पराओं और मान्यताओं क़ी दुहाई देकर समझातें है हम लोगों ने भौतिक प्रगति तो कर ली है ,शिक्षित और सभ्य भी कहलातें हैं प़र मानसिक स्तर प़र हम संकीर्ण और अंध-विश्वासी ही बने हुएँ हैं लेकिन हमें अंधे का भरोसा नहीं करना है.इश्वर तो हमारे भीतर ही है . जो सबकुछ जनता है,समझता है .सर्व-समर्थ है. उसको मानाने के लिए बाहर के गंडे-तावीज ,राख-भस्म क़ी ज़रुरत नहीं होती है.अत: सब कुछ छोड़कर अपने दुःख-कष्ट निवारण के लिए केवल अपनी ओर उन्मुख होना चाहिए .अपने भीतर ही वह इश्वर है जो चमत्कार का भण्डार है.इसलिए सर्व -शक्तिमान प़र विश्वास तो करो पर अन्धविश्वासी मत बनो.डॉ.शालिनीअगम२०१०
so trust yur self