Monday, April 12, 2010

abhilaasha

हे : प्रभु! बना दो मुझे एसा तरु ,
निर्लिप्त भाव से सबकी सेवा मैं करू,
फल- फूलों से हों आचार- विचार,
चंव,तने,जड़ सब जैसे संस्कार,
झुकी रहूँ सदैव तरु कि डालियों सी,
तृषा मिटाऊँ जग कि जठराग्नि की,
हर टूटे-थके मन को दूँ आराम,
व्यर्थ है जीवन न आये गर किसी काम,
मेरी शीतल छाया ले मेरा परिवार,
झर-झराऊँ पुष्पों को उन पार बारम्बार!
डॉ.शालिनीअगम,
1997

6 comments:

sona said...

shaliniji,

wonderful Aouther u r.
Sonaaaaa

ms.Pathak said...

Dear Shalu,
Iknow ur efficiency about ur home , ur family,ur work.u r amazing in all feilds.Love u....

SEEMA said...

HI, SHALU......REMEMBER ME.......YOUR SCHOOL FRIEND.....SEEMA
ONE DAY I TOLD U .........EK DIN TUM BAHUT BARI BANOGI.......

AAYUSH said...

Wow,
I have no words, first of all I am crazy of magical words, specially I love/love your words it is beautiful., but in natural way it is so touchy...............
AAYUSH

Anonymous said...

सभी नगमे साज़ में गाये नहीं जाते ,
सभी लोग महफ़िल में बुलाये नहीं जाते ,
कुछ पास रह कर भी याद नहीं आते ,
कुछ दूर रह कर भी भुलाये नहीं जाते
कभी नुम ना हो ये मासूम निगाहे ,
मेरी आरजू है आप सदा मुस्कुराये .
गम के साए रहे हम तक ही ,
आपके आशियाने में सदा बहार ही आये

reema said...

"Climb every mountain in your life. You will reach the top."


"Best wishes to you in whatever you do."